माता-पिता

बचपन और बुढापे में मन और शरीर दोनों बहुत नाज़ुक होते हैं. इसीलिए किसी बच्चे को या बुजुर्ग को संभालना, उनकी देखभाल करना बड़ा मुश्किल हो जाता हैं
वो कहते हैं की बचपन और बुढापा एक सरीखा होता हैं.
लेकिन क्या हम जो कहते हैं, उसे अपनाते हैं?

अपना बच्चा अगर बीमार हो तो उसकी देखभालमें हम रात-दिन भी गुज़ारे तो नहीं थकते.
क्या हम अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा में उसी प्रकार तत्पर रहते हैं?

बच्चे ने जगह जगह फैलाई हुई गन्दगी, उसकी विष्ठा, उसका बहता नाक इससे हम शिकायत करे न करे
लेकिन माता-पिता का रहेन-सहेन हमारी modern lifestyle से मेल नहीं खाता हैं और घृणास्पद लगता हैं

कल मैंने एक ४ साल का बच्चा देखा जो किसी फिल्मसे प्रभावित होकर शर्ट की collar को उपर चढ़ाकर, उंगली ऊँची उठाकर “आवाज़ नहीं करनेका” ऐसे शब्दोंमें फिल्मके हीरो की नक़ल उतार रहा था. आसपास बैठे हुए सभी लोग अत्यंत विलक्षणतासे और कौतुकपूर्ण नजरोसे बच्चे को देख रहे थे.
मैंने सोचा – बीस साल बाद इन्ही हावभावोंके साथ बच्चा उंगली से इशारा कर तुम्हे घरके बाहर निकालेगा, इतिहास फिरसे दोहराएगा

बच्चा चीखे चिल्लाये, रो कर, जिद कर अपनी बात मनवाए – हम मन में कोई नाराज़गी नहीं रखते
फिर क्यों कभी माता पिता आवाज़ ऊँची चढ़ाकर या करुणता से हाथ जोड़कर कोई बात आगे रखे तो हम आगबबूले हो जाते हैं?

किसी भरी सभामें बच्चेके कुछ embarrassing कह जाने पर हम react नहीं करेंगे, थोड़ी शर्मिंदगी महसूस होगी या नहीं भी होगी. लेकिन “बच्चा ही हैं” ये सोचके बात को टाल देंगे
पर अब तो अक्सर हम माँ-बाप को कहीं लेके जाने में ही embarrassment महसूस करते हैं. उनका होना हमारे status symbol के आड़ आ जाता हैं

ऐसा नहीं की हर बच्चा निहायती नालायक और हर माता-पिता आदरणीय और सहनशील होते हैं
पर दूर दूर तक सच्चाई यही हैं की प्रेम और आदरभाव के अभाव में कई माता-पिता रोते हैं

आज हमारा लगाव हमारे बेटे के प्रति ज्यादा और माँ-बाप के प्रति कम हैं. ये परंपरा तो चलती रहेगी, हमारे बुढ़ापे में कहानी ज़रूर पलटेगी और फिर तकलीफ होगी. बुढ़ापे में बच्चे से अपेक्षाएं बढेंगी लेकिन हमारा बच्चा उसके बच्चे की अपेक्षाएं पूरी करने में व्यस्त हो जाएगा और तुम्हारी तकलीफ बढ़ेगी.

मुझे लगता हैं – काफी समस्याएं कम हो जायेंगी यदि हम – हमको जन्म देनेवालोंके प्रति स्नेह ज्यादा और हमने जिनको जन्म दिया उनके प्रति लोभ कम रखें.
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2 thoughts on “माता-पिता

  1. Atreyee November 6, 2011 at 2:47 pm Reply

    Very well written Prat! Touching and extremely relevant to our generation.

  2. Sheetal Kshirsagar November 6, 2011 at 6:24 pm Reply

    Nice one…

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