Monthly Archives: March 2014

…मुझे पता नहीं

राह चलते हुए किसीका accident होते हुए देखा
वो दुखदायी नज़ारा देखकर मैंने एक लम्बी सी आह भरी
उस आह में उस इंसान और उसके परिवार के लिए हमदर्दी थी ?
या उसकी जगह मैं नहीं था इस बात की राहत थी ?
…मुझे पता नहीं

जब सामाजिक कर्तव्य हेतु भूखे नंगे बच्चोंसे
मिलने जाते हैं लोग और खिंचवाते हैं उनके साथ फ़ोटो
तब इरादा उस अनुभव को कैमरा में कैद करनेका होता हैं ?
या अपनी “social” personality दुनिया को जतानी होती हैं ?
… मुझे पता नहीं

जब बॉम्ब मेरा इलाका छोड़के कहीं और फटता हैं
और मैं बड़े गौर से TV पे “ब्रेकिंग न्यूज़” देखता हूँ
तब ऐसी भीषणता देखकर मन कांप उठता हैं ?
या अपने आप को ज़िंदा पाकर खुशनसीब लगता हैं ?
… मुझे पता नहीं

जब मेरी किसीभी तरह की मदद से, उस कोशिश से
किसीकी ज़िन्दगी में ख़ुशी और मुस्कराहट आ जाती हैं
तब उसकी वह भोली ख़ुशी देखकर दिल खुश हो जाता हैं ?
या “मैं” उस ख़ुशीका कारण बना – ये सोचकर अभिमान होता हैं ?
… मुझे पता नहीं

आज ज़िन्दगी अपने रंग में, अपने ढंग से जीने के कई मौके मिल गये
लेकिन ज़िन्दगी ऐसी भी तो मिली जो औरोंके काम आ सके
तब कही स्वयं से हटकर सकल की तरफ बढ़ना ज़रूरी हैं
अगर इतना पता नहीं, तो ज़िन्दगी का क्या मतलब? क्या मक़सद?
… मुझे पता नहीं

Advertisements
%d bloggers like this: